"मोरा" सावन गीत- रामदुलारी शर्मा
आलेख ...…......... झूलों पर लहराते सावन गीतों में स्त्री त्रासदी का स्वर ("मोरा" सावन गीत पर केंद्रित) अनादिकाल से चली आ रही स्त्री पराधीनता और त्रासदी का स्वरूप भले ही बदल गया हो लेकिन इस समाज में शोषण और उत्पीड़न की शिकार स्त्री की वेदना का स्वर बरकरार है।अलग - अलग समय में स्त्री उत्पीड़न के तरीके अलग रहे। पितृ सत्तात्मक समाज में स्त्री शोषण के क्षेत्र में पुरुषवादी विचारधारा का वर्चस्व शिखर पर रहा।आंसुओं की गहराई नापने के लिए एक गहरी दृष्टि की आवश्यकता है।ऐसे अनेक लोकगीत हैं जो सावन के झूलों पर गाए जाते हैं । इन गीतों में स्त्री वेदना की अनंतता का विस्तार उसकी जीवन गाथा के साथ चलता है।जैसे - राजस्थान के "ढोला मारू" की गाथा, ब्रज का "मोरा" सावन गीत, बुंदेलखंड का "चंदना की पाती" आदि अनेक-अनेक गीतों में स्त्री उत्पीड़न,पराधीनता और त्रासदी की अन्तर्वेदना प्रकट होती है। वर्षा ऋतु में विशेष रूप से गाये जाने वाले गीतों में सावन गीत,कजरी,झूमर और आषाढ़ मास से प्रा...